इस बात पर अक्सर बहस होती है कि "क्या भारत विश्व भर की युद्ध कलाओं का जन्मदाता है?"
इस बात के कई प्रमाण मिलते हैं कि विश्व के कई हिस्सों में युद्ध एवं द्वन्द्व कलाओं की कई शैलियाँ भारत से ही गई हैं. विभिन्न देशों में फैली युद्ध कलाओं की कई स्थितियां या Stances ऐसे हैं जिनका नाम आज भी ५००० वर्ष पुराना संस्कृत नाम है. जैसे थाईलैंड के मुए थाई की कई क्रियायों के नाम इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय मार्शल आर्ट्स भारत से दुसरे देशों में भारत की पारम्परिक वैदिक संस्कृति भी लेकर गए और साथ लेकर गए ध्यान और योग.
एक और चीज़ जो सुदूर पूर्व के मार्शल आर्ट्स की भारतीय संस्कृति के साथ जोडती है वो है गुरु शिष्य परंपरा, गुरु शिष्य का आपसी सम्बन्ध. गुरु के प्रति शिष्य का आदर भाव, अभ्यास शुरू कार्य से पहले सभी शिष्य गुरु के समक्ष झुकते हैं, तत्पश्चात अभ्यास शुरू होता है. प्रतियोगिता शुरू होने से पहले, अपने प्रतियोगी के सामने भी ऐसे ही झुकते हैं. जबकि पश्चिमी मार्शल आर्ट्स जैसे बोक्सिंग या Wrestling आदि में ऐसा देखने को नहीं मिलता. जुडो, कराटे और कुंग फु आदि में गुरु शिष्य के ऐसे सम्बन्ध का मूल गुरु शिष्य कि भारतीय परंपरा ही है.
इसी तरह जुडो कराटे ध्यान एवं साधना के साथ बड़े गहरे से जुड़े हैं, जबकि पश्चिमी मार्शल आर्ट्स में ऐसा नहीं है.

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें