आत्मरक्षा का विज्ञानं इतना साधारण नहीं जितना बाहर से दिखाई पड़ता है. आईये इस लेख में जानने का प्रयास करते हैं कि आत्मरक्षा प्रणाली किस प्रकार कार्य करती है. ये कार्य दो भागों में होता है. पहला इन्द्रियों द्वारा सन्देश मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है कि कोई खतरा है या कोई हम पर हमला कर रहा है. इसके पश्चात मस्तिष्क अंगों को संभव प्रतिक्रिया करने का आदेश देता है. जिस पर हमला जो रहा है यदि वह कोई साधारण महिला या पुरुष होगा तो उनकी प्रतिक्रिया अलग होगी और यदि वो किसी मार्शल आर्ट का अच्छा जानकार होगा तो उसकी प्रतिक्रिया अलग होगी.
मार्शल आर्ट का नियमित अभ्यास करने वाला व्यक्ति अपने आसपास के खतरों से अधिक सचेत रहता है. खतरे का आभास होते ही अत्यधिक शीघ्रता से प्रतिक्रिया व्यक्त कार्य या अपने बचाव के लिए प्रयास करने कि आदत मार्शल आर्टिस्ट को पढ़ चुकी होती है. वह खतरा भांप कर तुरंत सामने वाले के द्वारा किये गए वार से बचाव करता है और उसके वार का उत्तर देता है.
सुदूर पूर्व एशियाई देशों में मार्शल आर्ट्स भारत से ही गया. इन देशों में फैले कई मार्शल आर्ट्स का प्राचीन रूप भारत में आज भी है. आत्म रक्षा कि इन कलायों में दो तरह की लडाई होती है. एक हाथो और पैरों की लडाई और दूसरी हथियारों की लडाई.
पहले बात करते हैं हाथों और पैरों से की जाने वाली लडाई की. इस लडाई में सामने वाले के वार से बचने के लिए अपने शरीर के अंगों का प्रयोग बड़े कलात्मक ढंग से किया जाता है.
पहला सामने वाले के वार को रोकना या बेअसर करना.
दूसरा सामने वाले पर वार करना
सभी मार्शल आर्ट्स में सामने वाले द्वारा किये गए वार को रोकने के अलग अलग तरीके होते हैं लेकिन फिर भी प्रयास यही रहता है कि शरीर के नाज़ुक अंगों को बचाया जाये. उन पर लगने वाली हल्की सी चोट हार का कारन बन सकती है या शायद घातक क्षति और मृत्यु का भी. वार कको रोकने के लिल्ये शरीर के मांसल अंगों का प्रयोग किया जाता है. कभी भी शीधा हड्डियों से वार नहीं रोका जाता.
अच्छे मार्शल आर्टिस्ट कि एक और योग्यता देखने को मिलती है और वो है उसका लचीलापन. शरीर जितना अधिक लचीला होगा उतना ही उसके वार करने में निर्बाधता आएगी.
हाथों और पैरों की इस लडाई में जो एक और चीज़ महत्वपूर्ण है वो है हथियार. भारतीय मार्शल आर्ट्स में आज भी पारम्परिक हथियारों का प्रयोग होता है. जैसे तमिलनाडु के सीलाम्बम में चार तरह की लाठियों का प्रयोग होता है. इसी तरह कल्लारिपयाट्टू में चेरू वादी, शरीरा वदी आदि लाठियों और छड़ियों के अलावा उरूमि नामक एक लचीली तलवार का प्रयोग होता है.
खोजबीन के अनुसार पता चला है कि इसी भारतीय मार्शल आर्ट कल्लारिपयाट्टू औरी वज्रमुष्टि आदि ने बहार जाकर करते का रूप ले लिया. बौद्ध धरम कि छांव टेल यात्रा करके यह कलाएं देश से बाहर गयी और इसलिए इन पर बौद्ध धर्म कि छाप साफ़ नज़र आती है. कराटे का अभ्यास करने वाले का लक्ष्य अपने प्रतिद्वंदी को निहत्था और बेबस करना होता है. वो भी बिना कोई घटक चोट पहुंचाए. उनका यही विचार इस कला को बौद्ध धर्म के करीब लता है.
जानवरों कि रक्षा प्रणाली का बारीकी से निरिक्षण करके मानवीय शारीरिक ढाँचे का भली भाँती अध्ययन कर के जानवरों एवं मनुष्यों के किसी भी प्रकार के अद्रमण से स्वाम कि रक्षा करने कि इस कला का निर्माण किया गया जिसे मार्शल आर्ट कहते हैं. किन्तु समय के साथ साथ इसमें परिवर्तन आता गया. आज नए नए अथियारों के आ जाने से इसमें कुछ नए अध्याय जुड़ गए हैं. रिवोल्वर आदि आधुनिक अथियारों से बचने के लिए नए नए तरीके इजाद किये गए.
युवतियों के लिए इस कला में कई नयी नयी प्रक्रियाएं जुडी. समाज ने भी इन कलयों को हाथों हाथ लिया.
मार्शल आर्ट्स का नियमित अभ्यास करने से व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है. वह आसपास के खतरों से सचेत रहता है. मात्र गुंडे-बदमाश या किसी उपद्रवी ही नहीं बल्कि किसी दुर्घटना से भी वेह बच सकता है. आवश्यकता है तो सिर्फ तेज़ दिमाग और स्फूर्ति से भरे शरीर की.

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