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आयुर्वेद के आठ अंग

 आयुर्वेद के आठ अंग

Eight divisions of Ayurveda
आयुर्वेद के आठ अंग
(Eight Divisions of Ayurveda)   
वैद्य पंडित बीरबल मोदगिल
(Vaid Pandit Birbal Modgil)

         ऋषि मुनियों, देव-पुरुषों के अनुनय-विनय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही आयुर्वेद की सरंचना तो केर दी. तत्पश्चात मनुष्य को अल्पायु और अल्पबुद्धि जानकर इसे आठ भागों में बिभक्त केर दिया ताकि पढने- समझने में मनुष्य को ज्यादा कठिनाई न हो. वे आठ अंग इस तरह से हैं:- शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्य, कौमार्भ्रित्य, अगद्तंत्र, रासयांतंत्र और वाजिकरन्तान्त्रमिति

          १. शल्य से अभिप्राय:- नाना प्रकार के तिनके, काष्ठ, पत्थर, धूलि, लोहा, धातु, धेला, अस्थि, बाल, नख, पूय, स्राव, दूषित वर्ण, अन्तः शल्य, गर्भशाल्ये आदि को निकालने के लिए और  यंत्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि के प्रयोग के लिए एवं वर्ण के निश्चय के लिए, शल्य शास्त्र है. [इससे प्रमाणित होता है की शल्य-क्रिया (Operation) आज के युग की ही उपलब्धि नहीं अपितु आदि-अनादी-काल से चली आ रही चिकित्सा-प्रणाली है. आचार्य सुश्रुत को तो शल्य-क्रिया (Surgery) का पितामह मन गया है.

          जत्रु  [ग्रीवामूल अथवा अंग-संधि]  के उपर के रोग अर्थात, कान, आँख, मुख और नासिका आदि में होने वाले रोगों की शान्ति के लिए शालाक्य शास्त्र है. जत्रु शब्द से मिलता-जुलता शब्द 'जात' या 'जोता' है. बैलो को गाडी में जोतते समय उनके गले के नीचे जो पट्टी या रस्सी ' जूले' में बाँधी जाती है. उसे 'जोत' कहते हैं. यह पट्टी यहाँ गले में बांधती है, उस भाग का नाम जत्रु है.

          २. शलाका:- पटलबेधनी - यह अर्थ है. जिस भाग की चिकित्सा में शलाका का उपयोग सुश्रुत में बताया गया है. चूंकि जत्रु से उपर के मुख, नाक, कान, सर के रोगों में आँख के रोग ही अधिक हैं. इनमें आँख ही प्रधान [मुख्य] है. इसलिए इस अंग का नाम शालाक्य रखा गया है. जत्रु  [गर्दन] के उपर के रोगों में पराया शलाका से काम किया जाता है इसलिए 'शालाक्य' नाम हुआ.

          ३.) कायचिकित्सा:- सारे अंगों में होने वाले [प्रभाव डालने वाले] रोगों की अर्थात, ज्वर, रक्त्पित्त्स्होश [शोथ] उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि रोगों की चिकित्सा के लिए 'कायचिकित्सा' है. काय का अर्थ सम्पूर्ण शरीर है, इसकी चिकित्सा 'कायचिकित्सा' कहलाती है. ज्वर, अतिसारादी रोग अग्नि के दोष से ही होते हैं.

          ४.) भूत विद्या:- देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिटर, पिशाच, नाग, ग्रेहादी के आवेश से दूषित मनवालों की शान्ति-कर्म, बलिदान आदि के द्वारा ग्रहों की शान्ति के लिए 'भूत-विद्या' है.

          ५.) कौमार्भ्रित्य:- बालको के भरण-पोषण, धात्री [धाय या माँ] के दूध के दोषों के संशोधन के लिए, दूषित स्तन्य के कारण शारीरिक एवं दुश्त्ग्रेह के कारण [अगन्तुज] रोगों की शान्ति के लिए 'कौमार्भ्रित्य' है.

          ६.) अगद्तंत्र:- सांप, कीड़ा, मकड़ी, चूहे आदि के दंश से उत्पन्न विश्रोग की परीक्षा के लिए तथा नाना प्रकार के  विषों के संयोग से उत्पन्न हुए विकारों की शान्ति के लिए जो चिकित्सा की जाती है उसे 'अगद्तंत्र' के नाम से जाना जाता है.

          ७.) रसायन तंत्र:- शारीरिक अवस्था को बनाये रखने के लिए, आयु, मेद्धा और बल को बढ़ने के लिए, तथा रोगों को दूर करने की शक्ति के लिए 'रसायनतंत्र' है.

          ८.) वाजीकरणतंत्र:- स्वभाव से ही प्राकृतिक रूप में अल्प्वीर्य वाले पुरुषो में वीर्य को बढाने के लिए, वातादी से दूषित शुक्र वालो में शुक्र को शोधित करने के लिए, किन्ही कारणों से स्वाभाविक परिणाम में क्षीणशुक्र वालो में शुक्र की वृद्धि के लिए, वृद्धावस्था के कारण शुश्क्वीर्य वालो में शुक्र पैदा करने के लिए तथा स्त्रिप्रसंग में प्रहर्ष उत्पन्न करने के लिए की जाने वाली चिकित्सा 'वाजीकरणतंत्र' के अंतर्गत आती है.

          जिस तरह आजकल शक्ति के माप को घोडा मन गया है, उसी प्रकार प्राचीनकाल में भी घोड़े की ही शक्ति से तुलता की जाती थी. इसी से कहा है:-

          "अवाजिनं वाजिनं कुर्वन्ति अनेन-इति वजिकरनम. एनवा अतार्थ व्यज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद वाजिकरानाम"

          इन्ही आठ अंगों पैर टिका हुआ है सम्पूर्ण आयुर्वेद... यानी आयुर्वेद रुपी इस महान महल के उपरोक्त आठ स्तम्भ हैं. स्वस्थ्य सम्बंधित सभी समस्यायों का हल इसमें है. और जो इसमें नहीं वो कही भी नहीं है.
'विवेक-निकेतन' (Vivek Niketan)
देवनगर- सोनीपत १३०००१, (Devnagar, Sonepat - 130001 

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