भारतीय युद्ध कलाओं का विस्तार विश्व में किस प्रकार हुआ इस संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं . ऐसी सम्भावना है कि देश से बाहर जाने वाले व्यापारी अपने साथ कुछ योद्धायों या लड़ाकों को रखते हों जो उन्हें रास्ते में मिलने वाले लुटेरों और जंगली जानवरों से बचाते हों. पारम्परिक युद्ध कला के जानकार देश से बहार तो जाते ही होंगे लेकिन पहली बार बौद्ध भिक्षुकों ने इसे अन्य देशो के भिक्षुकों को सिखाया. ऐसा माना जाता है कि मार्शल आर्ट इस बौद्ध भिक्षुक के कारण ही देश से बाहर फ़ैल पाया.
सन ५२७ ई में बौधिधरम नाम के एक बौद्ध भिक्षुक बौद्ध धरम के सच्चे अर्थों का प्रसार करने के लिए चीन गया. तब तक उससे पहले आये भिक्षुकों ने शाओलिन मंदिर का निर्माण करवाकर एक अच्छी पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी. जब बौधिधरम ने ध्यान के नए विद्यार्थियों को शिक्षा देना प्रारंभ किया तो उसे पता चला कि वे विद्यार्थी उसकी शिक्षायों को बड़ी गंभीरता से ले रहे थे. यहाँ तक कि वे अपने आराम की भी चिंता नहीं करते थे. परिणामस्वरूप इसका उनके स्वस्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा था. बोधिधाराम को उनके स्वस्थ्य के लिए अलग से कुछ करने की आवश्यकता अनुभव हुई.
बौध भिक्षुक बोधिधरम कान्शिपुरम के राजा सुगंवास का पुत्र था. एक पारंपरिक भारतीय समाज के क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने के कारण उसका युद्ध कलायों का जानकार होना स्वाभाविक था. ऐसा भी पता चलता है की बोधिधरम को कोई रोग था जिस कारण स्वस्थ रहने के लिए उसे मार्शल आर्ट सिखाया गया. बोधिधरम हाथों से लड़ने की कला वज्रमुष्टि का जानकार था. कुछ विद्वानों का मत है की वेह कलारिपयाट्टू का भी अच्छा जानकार था. राजपाट छोड़ केर उसने संन्यास ले लिया था और बौद्ध धरम की दीक्षा ली.
उसने बौध शिक्षा ग्रहन करने वाले विद्यार्थियों को 18 तरह के व्यायाम सिखाये जिससे भिक्षुक स्वस्थ रहें ताठा उनकी सहनशीलता में भी वृद्धि हो. इसके पश्चात एक दूसरी समस्या सामने आई. भिक्षा माँगना सभी भिक्षुकों की दिनचर्या में शामिल था. जब वे भिक्षुक भिक्षा मांग कर वापिस लौट रहे होते थे तो लुटेरे उनसे भिक्षा में मिला सामान लूट लिया करते थे. इस समस्या के हल के लिए बोधिधरम ने भिक्षुकों को हाथों पैरों से लड़ने की कला सिखाई, और इस तरह शओलिन बोक्सिंग की परंपरा शुरू हो गयी. इसी लिए बोधिधरम को शओलिन बोक्सिंग का पिता माना जाता है. चीनी लोग उन्हें पो-टी-तमा के नाम से पुकारते हैं. धीरे धीरे शओलिन बोक्सिंग में अन्य कई मार्शल आर्ट विलय होते चले गए और शओलिन बोक्सिंग का नाम कुंग-फु पद गया. कुंग-फु अर्थात कड़ी मेहनत.


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