हू - हा - ही - हो की अजीब - अजीब आवाजें निकालकर उनका आपस में लड़ना, हाथों और पैरों की तेज़ क्रियाएं, अद्भुत शारीरिक संतुलन, हमारी सोच से भी तेज़ और ताकतवर वार, एक ही वार में टूटती मेज - कुर्सियां और दीवारें, ये दृश्य किसी भी चीनी फिल्म में देखने को मिल जायेगा. वास्तव में चीनी फिल्में मार्शल आर्ट का पर्याय बन चुकी हैं. चीनी फिल्म का कॉमेडियन भी मार्शल आर्ट का अच्छा जानकार होता है. चीनी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बन चूका है मार्शल आर्ट.
लेकिन क्या आप जानते हैं... चीन का शाओलिन मंदिर जो कि विश्व का सबसे बड़ा मार्शल आर्ट स्कूल माना जाता है, उसमें सर्वप्रथम युद्ध कला (Martial Arts) परंपरा शुरू करने वाला एक भारतीय ही था, जो कान्शिपुरम के राजा सुगनवास का पुत्र था. बोधिधर्म नाम के इस भिक्षुक ने ही चीनी भिक्षुकों को हाथों और पैरों से लड़ने कि कला सिखाई. धीरे धीरे यह विकसित होकर कुंग फू बन गयी.
बोधिधर्म कलारिपयाट्टू का अच्छा जानकार था. कलारिपयाट्टू में शरीर के अंगों और शास्त्रों का बड़े ही कलात्मक ढंग से उपयोग कर अपना बचाव किया जाता है और सामने वाले पर वार किया जाता है. मात्र आँखों के इशारे से इस कला का जानकार सामने वाले के मर्म केन्द्रों पर वार करके उसे निष्क्रिय कर सकता है. यह अनोखी आत्म रक्षा प्रणाली शरीर को स्वस्थ रखने की कला, मस्तिष्क कि शक्तियों को जागृत करने का विज्ञान और आत्मा को शुद्ध करने का भारतीय दर्शन ही भारतीय युद्ध कला (Indian Martial Arts) मार्शल आर्ट है. इस भारतीय मार्शल आर्ट ने भारतीय पारम्पिक वैदिक संस्कृति के साथ बौद्ध धर्म के सहारे विश्व भर में भ्रमण किया. यह एक कला भी है, विज्ञान भी और खेल भी.
मार्शल आर्ट का विषय असीमित है. आत्मविज्ञान का लेकर सामान्य जीवन तक इसमें जानने और सीखने के लिए बहुत कुछ है. मार्शल आर्ट का उद्देश्य मात्र लडाई सीखना या आत्मरक्षा ही नहीं बल्कि उससे भी कुछ बढकर है वो है, और वो है आत्मशुद्धि. ध्यान एवं साधना इसका एक अभिन्न अंग हैं. बिना चारित्रिक विकास के मार्शल आर्ट्स हानिकारक है.
विश्व में फैली युद्ध कलाओं कि कई क्रियायों के 5000 वर्ष पुराने संस्कृत नाम हमें बताते हैं कि ये कलाएं भारत से ही फैली. भारत में पारम्परिक युद्ध कलाओं में कल्लारिपयट्टु के अलावा मणिपुर कि थांग-ता, हिमाचल प्रदेश में थोडा, तमिलनाडु कि सीलमबम आदि कलाएं आज भी सुरक्षित हैं.


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