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युद्ध कलाएं और उनका इतिहास

युद्ध कलाएं और उनका इतिहास
मार्शल आर्ट एक कला
एक विज्ञान...
एक व्यायाम शारीरिक विकास के लिए
एक साधन मानसिक विकास का
एक प्रयास आत्मिक विकास का
एक तकनीक आत्मरक्षा की
एक अनोखी चिकित्सा पद्धति
एक रोचक खेल

मार्शल आर्ट के इतने पहलू हैं कि सभी के विषय में विस्तार से जानने का प्रयास करें तो शायद कई साल लग जायें. सभी पक्ष अलग-अलग होने पर भी एक दुसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि किसी एक विषय में बात करने पर दूसरा पहलू अपने आप ही सामने आ जाता है.

मार्शल आर्ट मात्र कोई शारीरिक व्यायाम नहीं है, ये प्रयास है अपनी आत्मिक मानसिक और शारीरिक शक्तियों को जागृत करने का. इसमें अपने भीतर विद्यमान शक्तियों को समझने का प्रयास किया जाता है और विभिन्न शारीरिक क्रियायों द्वारा उनके संतुलन को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है.

मात्र यही नहीं इसमें अपनी मांसपेशियों और अंगों की विभिन्न क्रियायों को समझ कर विकसित की गयी आत्मरक्षा प्रणाली सीखी जाती है ताकि किसी भी प्रकार की लडाई में स्वयं को सुरक्षित रखा जा सके.

मार्शल आर्ट सिर्फ शरीर से ही नहीं बल्कि मन से, मस्तिष्क से सीखा जाता है. इसके लिए आपको मन से तैयार होना पड़ता है. ज़रा सी हार मानी तो आप पिछड़ जायेंगे. आपका जोश बरकरार रहना ज़रूरी है. ज्यादा थकान होने पर दिल तो करता है कि बस करें. लेकिन अगर अब आप बीच में रुक गए तो फिर आपका आगे जाना ज़रा मुश्किल हो जाता है.

मार्शल आर्ट विश्व भर में फैला हुआ है. हर जगह इसका एक अलग नाम है, एक अलग रूप है, विश्व भर में सैंकड़ों तरह के मार्शल आर्ट हैं और कई तरह कि हैं इनकी शैलियाँ. चीन में है कुंग-फु, ला दायजी-चोन, रूस में साम्बा है तो जापान में जूड़ो कराटे और आईकीडो, जुजित्सू, कोरिया में ताई-कोन, सु-बाक-जी और ताई-कोन-डो है तो भारत में कलारिपयाट्टू, थांग-ता, सीलाम्बम, थोडा मार्शल आर्ट हैं . जो मार्शल आर्ट जिस जगह पर पला बढ़ा उस पर उस जगह कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक भौगोलिक पृष्ठभूमि कि छाप साफ़ नज़र आती है.

आत्मरक्षा या लडाई कि इस कला का इतिहास शायद उतना ही पुराना है जितना पुराना कि मनुष्य स्वयं है. माँसपेशियों और अंगों कि कार्यप्रणाली को समझकर यह कला रची गयी. साथ ही इसके लिए विभिन्न जानवरों कि आत्मरक्षा प्रणाली और शिकार प्रक्रिया को समझकर इसे विकसित किया गया. इसलिए वैज्ञानिक स्तर पर यह कला विश्वसनीय मानी जाती है. 

इस कला का विकास इतना आसान नहीं रहा. ऐसा माना जाता है कि करीब ५००० ई पू एक राजकुमार ने अपना सम्पूर्ण जीवन जानवरों के व्यवहार, उनकी सुरक्षा प्रणाली और शिकार प्रक्रिया को समझाने के लिए समर्पित कर दिया. फिर मनुष्य कि शारीरिक बनावट के अनुसार ये सब तकनीकें, मनुष्य पर प्रयोग करके देखी गयी. जिसमें संभव है किसी को घातक चोट भी लगी हो. या फिर किसी घातक वार ने किसी की जान भी ले ली हो.

पारम्परिक मूल से जुड़े मार्शल आर्ट का प्रत्येक आसन या अंग्स्थिति, मनुष्य के शारीरिक ढांचे, मांसपेशियों, हड्डियों और शारीरिक क्रियायों के बारीक निरिक्षण का ही परिणाम है.

कुंग-फु की चार आधारभूत स्थितियां या खड़े होने के तरीके हैं, ड्रेगन (Dragon Stance ), मेंडक स्थिति (Frog Stance), घुड़सवारी स्थिति (Horse Riding Stance) तथा सर्प स्थिति (Snake Stance). 

भारत का क्षत्रिय वर्ग सभी योद्धायों की भाँती एक युद्ध विद्या का अभ्यास करता था, जिसे वज्मानस कहते थे. खोज कहती है की यह कला काफी हद तक कराटे की ही भांति थी. इसकी विभिन्न शैलियाँ भी थी. ये थी असोरा (Asora), नर (Nara), युद (Yuda) और दनिरपत (Danirpata). इस कला के अभ्यासी पहले दूध से अपने हाथ भिगोते थे फिर पत्थर के टुकड़ों पर मुट्ठी से वार करते थे. इनके अलावा भारत में कई मार्शल आर्ट्स फलते फूलते रहे, जैसे कि कलारिपयाट्टू, थांग ता, सीलमबम, थोडा, मल्लविद्या, वज्रमुष्टि आदि. इनमें से कुछ मार्शल आर्ट भारत से दूसरे देशों में फ़ैल गए.


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