घोडे़ पर बैठकर एक ख़ास तरह के भाले की सहायता से लड़ने की कला है बोथाटी. उत्तर भारत के पंजाब क्षेत्र में सिक्ख धर्म के अनुयाई योद्धा 'निहंग' एक विशेष प्रकार की युद्ध कला का अभ्यास करते हैं, जिसका नाम है 'गतका' . इस 'गतका' युद्ध कला का ही एक भाग है 'बोथाटी कला' .
'बोथाटी' कला में प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे पर प्रहार करने के लिए जिस भाले का प्रयोग करते हैं, उसे भी बोथाटी के नाम से ही पुकारा जाता है . इस भाले की लम्बाई १० फुट होती है . इस भाले की नोक पर कपड़े की बनी हुई एक गेंद लगी होती है . जिसे लड़ाई से पहले रंग में डुबोया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भाले द्वारा किया गया प्रहार किस जगह लगा और कितना सटीक था . एकल प्रशिक्षण (अकेले अभ्यास करना) में पत्थरों के ढेर पर प्रहार किया जाता है .
मराठा भी घोड़े पर बैठ कर भाले से लड़ने की इस तरह की कला के लिए जाने जाते थे .
'बोथाटी' कला में प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे पर प्रहार करने के लिए जिस भाले का प्रयोग करते हैं, उसे भी बोथाटी के नाम से ही पुकारा जाता है . इस भाले की लम्बाई १० फुट होती है . इस भाले की नोक पर कपड़े की बनी हुई एक गेंद लगी होती है . जिसे लड़ाई से पहले रंग में डुबोया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भाले द्वारा किया गया प्रहार किस जगह लगा और कितना सटीक था . एकल प्रशिक्षण (अकेले अभ्यास करना) में पत्थरों के ढेर पर प्रहार किया जाता है .
मराठा भी घोड़े पर बैठ कर भाले से लड़ने की इस तरह की कला के लिए जाने जाते थे .

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