"ये फिल्म देखके तो मज़ाइ आ गया जी. मैं तो ये फिल्म दोबारा भी देख सकती हूँ."
ये शब्द थे मेरी पत्नी के, जो सुबह मुझसे नाराज़ थी और मैं लाचार. लेकिन अब मैं कपिल शर्मा का शुक्रिया अदा करना चाहता था, क्योंकि उसकी वजह से मेरी पत्नी की नाराज़गी दूर हो गई थी. उस वक्त हम बाहर निकल रहे थे रोहिणी के G3S सिनेमाघर से, कपिल शर्मा की Debut फिल्म 'किस किसको प्यार करूं' देख कर.
वैसे कई अलग-अलग आलोचनाएं और समीक्षाएं पढ़कर मैने निर्णय कर लिया था कि मैं ये फिल्म नहीं देखूंगा, लेकिन फिल्म देखने के लिए मुझे उस वक्त हाँ करनी पड़ी जब कपिल शर्मा की एक Fan ने मुझे धमकी देते हुए कहा,
"मैं नी बना री नाश्ता तुम खुद ई बना लो"
और अब फिल्म देखने के बाद मुझे बीवी का फिल्म देखने का निर्णय सही लग रहा था.
अगर एक दर्शक फिल्म के Technical Review के चक्कर में पड़ जाए तो फिल्म को Enjoy नहीं कर सकता. 'किस-किसको प्यार करूं' मुझे वाकई Entertaining लगी. मैंने फिल्म को Enjoy करने के साथ-साथ अपने आसपास बैठे दर्शकों के Comments का भी पूरा आनन्द लिया.
"ये वकील सई ऐ यार"
"अबे ये गाना भी कपिल ने गाया ऐ, कलाकार ऐ वैसे"
"डांस सीखना पड़ेगा इसे"
"एक्टर तो अच्छा ऐ यार, Serious ई कर दिया बन्दे ने"
बाहर निकलते समय...
"पैसे पूरे होगे बी"
(फोन पर किसी से) "अबे मस्त फिल्मै (गाली).., मिस कर दी तूने"
आम दर्शकों के ये Comments किसी भी आलोचक या समीक्षक के बयानों से ज़ादा दम रखते हैं. वैसे जब फिल्म चल रही थी तो इन Comments से ज़ादा ठहाके गूंज रहे थे हॉल में, और यही निशानी है एक Comedy फिल्म की कामयाबी की.
फिल्म का शीर्षक एकदम सटीक है. तीन पत्नियों और एक प्रेमिका के बीच फंसा शिव राम किशन उर्फ कपिल समझ नहीं पा रहा कि किस को प्यार करूं. फिल्म में जहाँ कपिल Comedy के अपने ख़ास अंदाज़ नें नज़र आए वहीं गंभीर दृश्यों में भी अपना कमाल दिखा गए. फिल्म में सभी कलाकारों ने सराहनीय काम किया.
फिल्म का Concept तो वाकई कमाल का है. एक साथ तीन-तीन खूबसूरत बीवियां और एक प्रेमिका..., ये तो नौजवानों की Fantasy है, Dream है. हालांकि स्क्रीनप्ले पर और अधिक काम होना चाहिए था. और भी अधिक Comical Situations बनाई जा सकती थी. लेकिन फिर भी फिल्म ने अच्छा Entertain किया.
फिल्म का पहला Shot... फिल्म..., उसकी कहानी या उसके बाद के दृश्यों के साथ मेल नहीं खाता. फिल्म के विषय में सिनेमाघर से बाहर निकल रहे एक दर्शक का Comment अब्बास मस्तान को आहत कर सकता है. वो Comment कुछ यूं था कि...
"यार ये फिल्म अब्बास मस्तान को नी बनानी चीए थी, या तो ये डेविड धवन बनाता, या फिर वो अपना... क्या नामै उसका... प्रियदर्शन"
फिल्म का End हल्का खिंचा सा लगा. मेरे ख्याल में फिल्म के अंत में शरद सक्सेना कह सकते थे कि...
"मैं भी अपनी दूसरी बीवी को ले ही आता हूँ."
कुल मिलाकर फिल्म पैसा वसूल लगी. इस फिल्म के जरिए कपिल शर्मा ने खुद को साबित कर दिखाया है. फिल्म की घोषणा के साथ ही शुरू हो चुकी नकारात्मक आलोचनाओं को नकारते हुए कपिल के प्रशंसकों ने ना सिर्फ फिल्म देखी बल्कि फिल्म को सराहा भी. ना तो कपिल ने अपने प्रशंसकों को निराश किया और ना ही कपिल के प्रशंसकों ने कपिल को.
फिल्म के सुखद अंत के विषय में सोचते हुए बड़ी मुश्किल से एक ऑटो वाले को घर तक छोड़ने के लिए मनाया. ऑटो वाला माना तो अब बीवी रूठ गई. आग बरसाती आंखो से मुझे देखने लगी...
"कुछ रह गया क्या?" मैंने पूछा.
"तुम तो खाना बाहर खिलाने वाले थे"
"अरे हां सच, मैं तो भूल ही गया था"
"मुझे भी भूल जाना किसी दिन"
और बीवी देवी कूद के ऑटो में बैठ गई. यार ये 3-4 बीवीयों वाला Concept फिल्म में ही अच्छा लगता है.
मुझे तो अब फिल्म का सुखद अंत भी बड़ा दुखद-दुखद सा लग रहा था.


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