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मार्शल आर्ट और मानसिक विकास

युद्ध कलाएं और मानसिक विकास 
(Martial Art and Mental Development)

करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान 
रसरी आवत जात है, सिल पर परत निसान 

इस दोहे का अर्थ, दोहे के आकार से कहीं जादा बड़ा है। इसमें मात्र इतना सत्य नहीं छिपा कि किसी भी कार्य का अभ्यास करने से व्यक्ति उसमें निपुण हो जाता है, बल्कि मनुष्य के मनोविज्ञान के गूढ़ रहस्य भी यह दोहा अपने आप में समेटे हुए है।

युद्ध कला का प्रशिक्षण करते समय बार बार विभिन्न प्रहारों को रोकने का अभ्यास करते करते मस्तिष्क तेज़ होता चला जाता है, और वार को बहुत कम समय में समझ कर तुरंत प्रतिक्रिया देने लगता है।  शरीर अपना बचाव करता है. पहले यह कार्य मात्र चेतन मन तक ही सीमित रहता है, किन्तु अधिक अभ्यास करने के कारण यह कला अवचेतन मन तक घर कर जाती है. जिस कारण इस कला का अभ्यासी अचानक हुए हमले से भी अपना बचाव कर लेता है. 

मनुष्य के मस्तिष्क के दो हिस्से visual cortex और Parietal Cortex मनुष्य की ध्यान से देखने की क्षमता में बड़ा योगदान देते हैं।  Parietal Cortex आसपास दिखाई दे रही हर चीज़ को देखता और उनमें होने वाले परिवर्तनों को सूचीबद्ध करता है।  Visual Cortex आसपास से ध्यान हटाकर किसी एक चीज़ को देखने में मदद करता है. किसी चीज़ को ज़्यादा ध्यान से देखने पर Visual Cortex पर ज़ोर पड़ता है. Parietal Cortex कार्य करना कम कर देता है जिस कारण आसपास होने वाले कई परिवर्तन दृश्य क्षेत्र में होने पर भी दिखाई नहीं पड़ते।  

मार्शल आर्टिस्ट को इन्हीं सब समस्यायों से जूझना होता है। लेकिन वह सचेत होना सीख जाता है।  कला के अवचेतन मन तक घर कर जाने के पश्चात ही वह अचानक हुए आक्रमण से भी बच जाता है. इसलिए जितना अधिक अभ्यास किया जाये व्यक्ति युद्ध कला में  उतना ही  जाता है।  


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