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पारम्परिक युद्ध कलाएं (Martial Arts): कला, विज्ञान या खेल

पारम्परिक युद्ध कलाएं (Martial Arts): कला, विज्ञान या खेल
पारम्परिक युद्ध कलाएं (Martial Arts) आत्मरक्षा का विज्ञान है
युद्ध करने की कला है
मानसिक एवं आत्मिक विकास की तकनीक है
एक व्यायाम है जो सम्पूर्ण स्वस्थ्य देता है

पारम्परिक युद्ध कलाओं में, खाली हाथ और विभिन्न अस्त्रों शास्त्रों से लड़ना सीखा जाता है। अपने शरीर को ही हथियारों की तरह प्रयोग करने की कला सीखी जाती है। विश्व भर में मार्शल आर्ट की कई शैलियाँ पायी जाती हैं। करीब 55 अलग-अलग देशों में कई तरह की युद्ध कलाएं (Martial Arts) पायी जाती हैं। जिनमें से 40 युद्ध कलाओं (Martial Arts) को प्रमुख माना गया है।  

युद्ध कलाओं (Martial Arts) के क्षेत्र में भारत भी पीछे नहीं है। भारत में करीब 18 मुख्य युद्ध कलाएं (Martial Arts) पायी जाती हैं। 

भारतीय पारम्परिक युद्ध कलाओं का इतिहास भी काफी पुराना है। भारत में लगभग 5000 वर्ष पूर्व युद्ध कलाओं का जन्म हुआ मन जाता है। ऐसा माना जाता है कि उस समय के एक राजकुमार ने जानवरों की शिकार एवं आत्मरक्षा प्रणाली को समझ कर, उसे मानव शरीर के अनुसार ढालकर, उसे लागू करने के प्रयास में ही अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया।  

प्राचीन काल में भारत का क्षत्रिय वर्ग वजमानस नाम के एक युद्ध कौशल का अभ्यास किया करता था, जो जापान के आधुनिक कराटे जैसी है। यानि कि इसका अर्थ ये हुआ कि कराटे भी वजमानस से ही निकला है। 

 भारतीय युद्ध कला कल्लरीपयट्टु और गतका विश्व प्रसिद्ध हैं. विश्व की प्रमुख युद्ध कलाओं में इनकी अपनी एक अलग पहचान है। कल्लरीपयट्टु दक्षिण भारत के केरल राज्य में प्रचलित है। कल्लारिपयाट्टू में शरीर के अंगों और शास्त्रों का बड़े ही कलात्मक ढंग से उपयोग कर अपना बचाव और सामने वाले पर वार किया जाता है। मात्र आँखों के इशारे से इस कला का अच्छा जानकार, सामने वाले के मर्म केन्द्रों पर वार करके उसे निष्क्रिय कर सकता है। 

कल्लरीपयट्टु की मर्म चिकित्सा में मर्म-केन्द्रों द्वारा जटिलतम रोगों का उपचार भी किया जाता है। इस पद्धति का अच्छा ज्ञाता में हलके से प्रहार से किसी के प्राण भी ले सकता है। इसलिए ये पद्धति हर किसी को नहीं सिखाई जाती। इस युद्ध कला ने बौद्ध धर्म के सहारे विश्व भर में भ्रमण किया। यह एक कला भी है, विज्ञान भी और खेल भी। चीन के शाओलिन मंदिर में एक भारतीय बौद्ध भिक्षुक बोधिधर्म ने भिक्षुकों को शारीरिक रूप से स्वस्थ और सुदृढ़ बनाने के लिए यह कला सिखानी शुरू की थी। बाद में यही शाओलिन मंदिर सशक्त बौद्ध भिक्षुकों का एक गढ़ बन गया। शाओलिन मंदिर इस बात का प्रमाण है कि स्वस्थ और सशक्त शरीर के द्वारा ही प्रभु सिमरन किया जा सकता है। अब इन युद्ध कलाओं को आप चाहे कला कहें, विज्ञानं कहें या खेल कहें, यह शरीर, मन तथा आत्मा को शुद्ध एवं विकसित करने का सर्वोत्तम तरीका है।

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