वैद्य बीरबल मुद्गल
"दुनिया बनाये वाले क्या तेरे मन में समाई
कहे को दुनिया बनायीं, तुने काहे को दुनिया बनायीं"
स्वर्गीय शेलेन्द्र का ये प्रश्न आज भी उत्तर की बात जोह रहा है. और आने वाले समय में भी सहस्राब्दियों तक निरुत्तर ही रहेगा. इस प्रश्न का उत्तर न तो आज ही किसी के पास है और न आने वाली पीढियां ही इसका कोई सटीक उत्तर ढून्ढ पायेंगी. शलेन्द्र कवि थे. उन्होनें अपने प्रश्न को कविता रूप में उछाला. आम आदमी, जो आम से थोडा अलग है, उपर है, अपनी बुद्धि का प्रयोग करना जनता है, प्रयोग करता है. इस प्रश्न को लेकर उसके मन में भी कौतुहलवश अनेकों तरह के प्रश्न समय-समय पर सर उठाते रहे हैं और आगे भी उभरते रहेंगे.
१. सृष्टि-उत्पत्ति के पीछे ईश्वर का क्या प्रयोजन रहा होगा?
२. परमात्मा को जगत बनाने की क्या और क्यों आवश्यकता महसूस हुयी?
३. इस सृष्टि से, विशेषकर... मनुष्य से भगवन को क्या सरोकार था या है?
जब कि हमारे धर्म-ग्रन्थ एवं ऋषि-मुनि ताल-ठोक कर कहते हैं कि प्रभु को तो अपनी पूजा-अर्चना तक भी करवाने कि इच्छा या आवश्यकता नहीं है.
मनुष्य मंदिर जाये... न जाये, जोत-बत्ती करे... न करे, पूजा-पाठ, ध्यान समाधी में लीं हो... न हो, ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ता. उसे किसी तरह का लाभ-हानि नहीं होता. हाँ... इस सब का प्रभाव मनुष्य पैर अवश्य पड़ता है. मनुष्य ज्व्वेँ में सुधार होता है. मन- शांत एवं जीवन सुखमय बनाने में सहयोग मिलता है.
परन्तु... प्रश्न 'काहे को दुनिया बनायीं' अथवा 'भगवन को सृष्टि कि उत्पत्ति कि आवश्यकता क्यों महसूस हुयी?' यु ही मुंह बाये खड़ा है, यथावत, दक्ष प्रश्न... उत्तर कि प्रतीक्षा में.
एक अन्य प्रश्न:- 'पहले पुरुष पैदा हुआ या फिर सृष्टि में औरत पहले आई? अपितु मुर्गी पहले आई या अंडा? मुर्गी पहले आती तो कैसे? अंडा पहले आया तो कहाँ से, किसने दिया?' प्रश्न जटिल होते हुए भी निम्नांकित दलील से मन को संतुष्ट किया जा सकता है.
ईश्वर [शिव-परमात्मा] अर्ध-नारीनटेश्वर हैं. यानि स्वयं ही स्त्री भी पुरुष भी...
परमात्मा को सृष्टि से जब कुछ लेना देना ही नहीं है तो उसकी और से सृष्टि कि उत्पत्ति करने कि आवश्यकता का कारण...? अंततः हर कार्य के पीछे कोई कारण तो होता है है.
छोटा सा ... नन्हा सा बालक मित्तित के छोटे-बड़े खिलोने [घोडा, गए, बकरी, चिड़िया, तोता आदि] निर्मित करता है, अपने मनोरंजन के लिए. और फिर थोड़ी देर बाद पसंद न आने पर, अच्छे न लगने पर स्वयं ही उन्हें तोड़ भी देता है. हमारे धर्म-ग्रंथों एवं ऋषि-मुनियों का कहना कुछ इसी भावना को इंगित करता है. उनका कथन कि:- परमतत्व, सम्पूर्ण, लीलामय परमात्मा कि बस यु ही इच्छा हुयी और उन्होंने खेल-खेल में सृष्टि कि रचना कर डाली.
लेख के अनावश्यक बढ़ जाने के डर से हम इसे यही विराम देकर सृष्टिक्रम कि और चलते हैं. क्योंकि परमात्मा और उसकी लीला [माया] को आज तक न तो कोई जान पाया और न कोई आने वाले युगों में ही जान पायेगा.
वेद-पुराण और बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, तपस्वी आदि भी उसे पूर्णतया जान नहीं पाए और 'नेति-नेति' कह केर चुप्पी साध गए, शांत हो गए.
ईश्वर... जानने का नहीं... मानने का तत्व है. उस परम-शक्ति को जाना नहीं केवल मन ही जा सकता है. और मानना चाही भी...
आयुर्वेद ग्रन्थ 'अमृतसागर' अनुसार:-
"आत्मा ज्योतिश्चिदानंदरूपो नित्यश्च निस्पृह: l
निर्गुण: प्रकृतेयोगात सगुण: कुरुते जगत ll"
अर्थात ज्योतिस्वरूप, चिदानंद, नित्य निस्पृह, निर्गुन्ब्रह्म [शिव-परमात्मा] प्रकृति के योग से सगुण होकर जगत को उत्पन्न करता है.
अर्थात उस परमेश्वर कि प्रकृति यानि माया ने इस 'अनित्य संसार' को 'नटकौतुक' सदृश्य बनाकर इच्छारूपी 'महातत्व' को बनाया. उस ' महातत्व' से 'अहंकार' उत्पन्न हुआ. जो तीन प्रकार का है. रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण. तत्पश्चात: तमोगुणरुपी अहंमार ने सतोगुण और रजोगुण से मिलकर १० इन्द्रियाँ और मन को उत्पन्न किया.
इन १० इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और ५ कर्मेन्द्रियाँ हैं.
यथा १. कर्ण, २. त्वचा, ३. नेत्र, ४. जिह्वा, ५. नासिका. ये पाँचों ग्यानेंद्र्याँ हैं. एवं-
१. वाणी, २. हस्त, ३. पाद [पाँव], ४. लिंग, ५. गुदा. ये पांच कर्मेंद्रियां हैं.
तमोगुण से अधिक सतोगुणयुक्त अहंकार से पन्च्तान्मत्रयें उत्पन्न कीं.
१. शब्द, २. स्पर्श, ३. रूप, ४. रस, ५. गंध...
तन्मत्रायों से पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए:- यथा - १. शब्द से आकाश, २. स्पर्श से वायु, ३. रूप रूप से अग्नि, ४. रस से जल, ५. गंध से पृथ्वी...
सो- कान का विषय शब्द १. त्वचा का स्पर्श, ३. नेत्रों का रूप, ४. जिह्वा का रस (स्वाद), ५. नासिका का गंध... ये ज्ञानेन्द्रियों के ५ विषय हैं.
इसी तरह कर्मेंद्रियों के विषय जाने:- १. वाणी का विषय भाषण [बोलना], २. हस्त का ग्रहन करना, [लेना-देना व अन्य कार्य करना], ३. पाद [पाँव] का विषय चलना, ४. लिंग का मथूं और ५. गुदा का विषय [कार्य] मलत्याग हैं.
१. प्रधान, २. प्रकृति, ३. शक्ति, ४. नित्य और ५. विकृति. ये पांच प्रकृति के नाम हैं और ये प्रकृतियाँ 'शिव-परमात्मा' से मिली हुयी रहती हैं.
उक्त्क्रमानुसार ये १४ तत्व उत्पन्न हुए. अर्थात १. महतत्व, १ एहंकार, ५ तन्मात्रा, १ प्रकृति, १० इन्द्रियाँ, १ मन और ५ महाभूत.
इन सभी ने मिलकर शरीर-रुपी एक घर बनाया. तब इस घर [शरीर] में जीवात्मा शुभाशुभ कर्मो के अनुसार स्वाधीन होके प्रवेश हुआ और 'मन' रुपी दूत वश में हो निवास करने लगा. इसी जीव्युक्त शरीर को 'देहि' या 'पिंड' का नाम भी दिया गया.
यह देह [शरीर] द्वारा पाप-पुण्य, सुख-दुखों से व्याप्त होकर जीवात्मा मन रुपी घोड़े पर सवार होकर स्वकृत [अपने द्वारा किये] अछे-बुरे कर्मों के कारन कर्म-बंधनों में बंधा हुआ बार-बार इसी सृष्टि-चक्र में घूमता रहता है. तथापि काम, क्रोध, लोभ, मोह, एहंकार, दासों इन्द्रियें और बुद्धि ये सभी अज्ञानदशा में जीवात्मा के बंधन के हेतु हैं.
मनुष्य के भीतर की जीवात्मा आत्मज्ञानी होने से ही जीव व जीवात्मा जम-मरण के बंधन से मुक्त होता है. कुछेक शब्दों, पृष्ठों या पुस्तकों में भी इसका वर्णन कर पाना असंभव है. अध्यात्म की राह लम्भी भी है व कठिन भी...
इस पथ के पथिकों [सभी] के अपने अलग-अलग अनुभव होते हैं.


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें