मार्शल आर्ट... अर्थात युद्ध कला,
एक ऐसी कला जिसे आप विज्ञान भी कह सकते हैं . यदि हम इस कला के इतिहास, जन्म अथवा आरम्भ को एक लेख में पिरोने का प्रयास करें तो यह सरल नहीं होगा, क्योंकि विश्वभर में अनगिनत युद्ध कलाएं हैं तथा अधिकतर युद्धकलाओं के विषय में मिलने वाली जानकारी अधूरी तथा बिखरी हुई है .
मार्शल आर्ट के जन्म के विषय में बुद्धिजीवियों के अलग-अलग मत हैं जिनमें से एक विचार यह है कि-
इस मत के अनुसार यह कला पहले साधारण स्व-सुरक्षा की कला थी, किन्तु समय के साथ-साथ जब मनुष्य समूहों में रहवे लगा और समूह बड़े होने लगे तो यह कला भी विकसित होकर युद्ध कला के रुप में परिवर्तित हो गई.
इस विचार के अनुसार संघर्ष को युद्ध कलाओं का जन्मदाता कहा गया वृष्टि के प्रारंभ से ही जीवन को जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ा इस मेँ छोटी छोटी लड़कियाँ भी शामिल थी जेसी भोजन के लिए लडाई आश्रय स्थल के लिए लडाई प्रेम का अधिकार पाने के लिए लडाई पहले मनुष्य जानवरो की तरह लगता रहा होगा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए अपने हाथ और धातु का प्रयोग करता रहा होगा धीरे धीरे लकडी पत्थर इत्यादि चीजोँ से सामने वाले पर वार करना सीखा जिस लकडी से उसने अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया होगा जान तेरे होगा ये घयल किया होगा उसे अपना हथियार समझ अपने पास ही रखा होगा धीरे धीरे इन हथियारों के आकार आकृतियाँ प्रकार बदलते दीक्षित होते रहे होंगे आकृतियाँ व प्रकार बदलते रहे होंगे
जैसे-जैसे मानव सभ्य होता चला गया उसने अपनी पुरानी लडाईयों से प्रहार करने तथा बचने के कई तरीके सीख लिए कुछ दांव-पेंच उसने दूसरों की लडाई से सीखे तो कुछ दांव विभिन्न शिकारी जानवरों को देख कर सीखे. यह दांव पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाए गए. पिछली पीढ़ी के अनुभव में नई पीढ़ी के द्वारा खोजे गए नए दांव-पेंच शामिल होते चले गए और इस तरह सुरक्षा प्रणाली एक शैली बन गई.
फिर कुछ बुद्धिजीवी द्वारा इन शैलियों पर और भी परीक्षण, अनुसंधान तथा अध्ययन किए जाने के बाद ये शैलियां सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा सुनियोजित होती चली गई और कई पीढियों के सदियों के अनुभव के परिणामस्वरुप ये शैलियां विकसित होकर युद्ध कलाएं बन गई.
इस प्रकार की युद्ध कलाओं की जो जानकारी आज उपलब्ध है, उनमें शारीरिक या मानसिक शक्तियों का ऐसा प्रयोग भी शामिल है जो आज के युग में असंभव प्रतीत होता है. जैसे उड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचना, अपने हाथ या आँखों के संकेत मात्र से सामने वाले को बेहोश करना, अपने हाथ के प्रहार से पेड़ को गिरा देना.
सदियों की इस यात्रा में इन युद्ध कलाओं में जहाँ विकास हुआ वहीं बहुत कुछ ऐसा भी था जो खो गया, या तो वो सिर्फ कहानियों में ही रह गया या फिर वो मात्र कपोल कल्पनाएं ही था. ये कल्पनाएं थीं या सच यह अभी तक एक प्रश्न ही है.
एक ऐसी कला जिसे आप विज्ञान भी कह सकते हैं . यदि हम इस कला के इतिहास, जन्म अथवा आरम्भ को एक लेख में पिरोने का प्रयास करें तो यह सरल नहीं होगा, क्योंकि विश्वभर में अनगिनत युद्ध कलाएं हैं तथा अधिकतर युद्धकलाओं के विषय में मिलने वाली जानकारी अधूरी तथा बिखरी हुई है .
मार्शल आर्ट के जन्म के विषय में बुद्धिजीवियों के अलग-अलग मत हैं जिनमें से एक विचार यह है कि-
- असभ्य से धीरे धीरे सभ्य होते चले गए मनुष्य ने स्वयं ही यह कला विकसित की थी.
इस मत के अनुसार यह कला पहले साधारण स्व-सुरक्षा की कला थी, किन्तु समय के साथ-साथ जब मनुष्य समूहों में रहवे लगा और समूह बड़े होने लगे तो यह कला भी विकसित होकर युद्ध कला के रुप में परिवर्तित हो गई.
इस विचार के अनुसार संघर्ष को युद्ध कलाओं का जन्मदाता कहा गया वृष्टि के प्रारंभ से ही जीवन को जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ा इस मेँ छोटी छोटी लड़कियाँ भी शामिल थी जेसी भोजन के लिए लडाई आश्रय स्थल के लिए लडाई प्रेम का अधिकार पाने के लिए लडाई पहले मनुष्य जानवरो की तरह लगता रहा होगा अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए अपने हाथ और धातु का प्रयोग करता रहा होगा धीरे धीरे लकडी पत्थर इत्यादि चीजोँ से सामने वाले पर वार करना सीखा जिस लकडी से उसने अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया होगा जान तेरे होगा ये घयल किया होगा उसे अपना हथियार समझ अपने पास ही रखा होगा धीरे धीरे इन हथियारों के आकार आकृतियाँ प्रकार बदलते दीक्षित होते रहे होंगे आकृतियाँ व प्रकार बदलते रहे होंगे
जैसे-जैसे मानव सभ्य होता चला गया उसने अपनी पुरानी लडाईयों से प्रहार करने तथा बचने के कई तरीके सीख लिए कुछ दांव-पेंच उसने दूसरों की लडाई से सीखे तो कुछ दांव विभिन्न शिकारी जानवरों को देख कर सीखे. यह दांव पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाए गए. पिछली पीढ़ी के अनुभव में नई पीढ़ी के द्वारा खोजे गए नए दांव-पेंच शामिल होते चले गए और इस तरह सुरक्षा प्रणाली एक शैली बन गई.
फिर कुछ बुद्धिजीवी द्वारा इन शैलियों पर और भी परीक्षण, अनुसंधान तथा अध्ययन किए जाने के बाद ये शैलियां सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा सुनियोजित होती चली गई और कई पीढियों के सदियों के अनुभव के परिणामस्वरुप ये शैलियां विकसित होकर युद्ध कलाएं बन गई.
इस प्रकार की युद्ध कलाओं की जो जानकारी आज उपलब्ध है, उनमें शारीरिक या मानसिक शक्तियों का ऐसा प्रयोग भी शामिल है जो आज के युग में असंभव प्रतीत होता है. जैसे उड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचना, अपने हाथ या आँखों के संकेत मात्र से सामने वाले को बेहोश करना, अपने हाथ के प्रहार से पेड़ को गिरा देना.
सदियों की इस यात्रा में इन युद्ध कलाओं में जहाँ विकास हुआ वहीं बहुत कुछ ऐसा भी था जो खो गया, या तो वो सिर्फ कहानियों में ही रह गया या फिर वो मात्र कपोल कल्पनाएं ही था. ये कल्पनाएं थीं या सच यह अभी तक एक प्रश्न ही है.


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