Birth of Ayurveda
आयुर्वेद की उत्पत्ति:
आयुर्वेद की उत्पत्ति:
(Birth of Ayurveda)
वैद्य पंडित बीरबल मोदगिल
शरीर और जीव का संयोग जीवन है. जीवान्युक्त समय आयु तथा शरीर से जीव का वियोग मृत्यु कहलाता है. जिसके द्वारा पुरुष आयु को पूर्णतया हो, तथा दुसरे की आयु भी ज्ञात केर ले, ऋषि मुनियों की दृष्टि में वह आयुर्वेद है, क्योंकि इसके द्वारा भक्ष्य-अभक्ष्य पदार्थो के गुण-कर्म का ज्ञान होने पैर भक्ष्य का सेवन एवं अभक्ष्य का त्याग होता है.
सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने प्रजा के हितार्थ आयुर्वेद को प्रकाश करने हेतु एक लाख श्लोको की ब्रह्म-संहिता बना केर अपने पुत्र दक्ष को पढाई. दक्ष ने सुर्यपुत्र अश्विनी कुमारो को पढाया. अश्विनी कुमारों ने अपने नाम से 'अश्विनी कुमार संहिता' (Ashwin Kumar Samhita or Sanhita) का सृजन किया. एक युद्ध में भैरव द्वारा काटे गए ब्रह्मा जी के सर को जोड़ा. देव- दानव संग्राम में अंग-भंग हुए देवतायों को पूर्ववत किया. पूषा देवता के दांत जोड़े. भाग देवता के नेत्र सुधारे, वृद्ध च्यवन ऋषि को तरुण बनाया. और इस तरह के कार्यों द्वारा अश्विनी कुमार देव पूज्य व वैद्य शिरोमणि कहलाये.
इन्द्र ने अश्विनी कुमारों से आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहन कर अत्री आदि मुनियों को पढाया. अत्री मुनि ने अपने नाम से 'आत्रेय- संहिता' (Atrey Samhita or Sanhita) तयार कर, अग्निवेश, भेद, जातुकर्ण, पराशर आदि ऋषियों को शिक्षा दी.
एक बार हिमालय के पास मुनि भरद्वाज जी सहित अनेको ऋषि-मुनि एकत्र हो विचार करने लगे की:- 'धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का कारन यह कलेवर (शरीर) ही है. यदि यह निरोगी रहे तो सर्वकार्यसिद्धि हो सकती है. अतः. आप इन्द्र से आयुर्वेद-संहिता लायें. तब भरद्वाज जी इन्द्र से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त कर, सभी ऋषियों में इससे प्रवृत्त किया.
अन्य जब ब्रह्मा जी ने वेदों की रचना की, उस समय शेष जी वेद- वेदांगों को प्राप्त होकर अथर्ववेद के अंगभूत आयुर्वेद का ज्ञान लिए पृथ्वी पैर गुप्त रूप से विचरते हुए, चर्गूढ़ (सेवक) के सदृश्य रोगियों को आरोग्य प्रदान करते हुए 'चरकसंहिता' (Charak Samhita or Sanhita) बनायीं.
देवराज इन्द्र की इच्छानुसार लोकोपकार हेतु धन्वन्तरी काशीपुरी में अवतरित हुए और काशीनरेश दिवोदास के नाम से रोगियों को आरोग्य प्रदान करते हुए अपने नाम की धन्वन्तरी संहिता भी बनायीं.
विश्वामित्र ऋषि ने अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा कि काशी में दिवोदास राजा धन्वन्तरी के अवतार हैं. तो उन्होंने अपने पुत्र सुश्रुत को उनसे आयुर्वेद कि शिक्षा ग्रहण कर लोकहित में कार्य करने कि आज्ञा दी. सुश्रुत के साथ एक सौ अन्य मुनियों ने भी भगवन दिवोदास धन्वन्तरी से आयुर्वेद कि शिक्षा प्राप्त की.
आयुर्वेद 'अथर्ववेद' का उपांग है. इसे ब्रह्मा जी ने एक लाख श्लोकों और एक हज़ार अध्यायों में कहा था. फिर मनुष्यों को अल्पायु वाले एवं अल्पबुद्धि वाले जानकर इसे आठ अंगों में बनाया.
यह आठ अंग निम्नलिखित हैं:- यथा-शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमार्भ्रित्यम, अगद्तंत्र, रसायांतंत्र, वाजिकारान्तान्त्रभित्ति. आयुर्वेद समंदर के सामान विशाल एवं गहरा है. इसके ज्ञान-कथन के लिए कुछ शब्द या पृष्ठ पर्याप्त नहीं हो सकते.
आयुर्वेद स्वयं में स्वतंत्र एवं सम्पूरण चिकित्सा पद्धति है. यह किसी अन्य चिकित्सा पद्धति कि सहायक नहीं. अपितु अक्सर वैद्य लोग अन्य पद्धतियों द्वारा रोगी कि चिकित्सा करते हुए आयुर्वेदिक अयुशाधियों का प्रयोग करते हैं. या फिर इस पद्धतीनुसार चिकित्सा के दौरान अन्य चिकित्सा पद्धतियों कि औशादियों कि सहायता भी लेते हैं. जो कि सर्वदा अनावश्यक है.
आयुर्वेदिक चिकित्सा-प्रणाली उतनी ही प्राचीन है जितना कि पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म या जीवन का इतिहास...
(The most ancient medical therapy is Ayurveda)
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